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खिला फिर बेला
 

अम्बर पर तारों का मेला
आधी रात खिला फिर बेला

सुंदर सजकर आयी रजनी
कुछ सहमी सकुचायी रजनी
घूँघट में शरमायी रजनी
चाँद खड़ा क्यों दूर अकेला

बीती रात सुबह अब आती
कली कली भी गान सुनाती
तितली अपने पर फैलाती
उपवन खिल जाता अलबेला

सपन सलोने नयन बसाये
सजनी मन ही मन मुस्काये
मधुर वचन से अधर पगाये
थाम लिया जीवन का रेला

- वैशाली
१५ जून २०१५

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