अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

घटनाएँ हरसिंगार की

 

गंध-हार की
भीनी-भीनी हैं घटनाएँ हरसिंगार की

उधर रूपसी धूप
नदी पर तैर रही है
इधर हवा ने
छुवन-पर्व की कथा कही है

साँस सुखी है -
कौंध जग रही कनखी के पहले दुलार की

पारिजात का बिरछ
हमारे आँगन में भी
फूल झरे हैं रात
खिले हैं कुछ मन में भी

साखी देतीं
पीतबरन तितलियाँ सुबह के खुले द्वार की

इक पिडुकी का जोड़ा रहता
हरसिंगार पर
वहीं पंछियों के देवा का
है पूजाघर

पत्ते-पत्ते ताल दे रहे
लय-धुन मीठी है बयार की

कुमार रवीन्द्र
१८ जून २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter