अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

क्यों शिरीष के फूलों ने
 

लू से खेले
बूँदों की मनमानी भी सह ली
क्यों शिरीष के फूलों ने ये भूलें कीं पहली

पात-पात में झूल उठा
पुरवा-पछवा का नेह
हुई परागित यों हौले से
अंग लगा ली देह

फुदकी ने कुछ उनकी सुन ली
अपनी भी कह ली

गन्धर्वों की कहें कल्पना
या परियों की खोज
जी चाहा तब संगत कर ली
इन पुरखों की रोज़

आपाधापी से ऊबी
तबीयत पल में बहली

बिछ जाते हैं पूजाओं के
रस्तों में चुपचाप
हरियाली-सी हो जाती हैं
सभी सिद्धियाँ आप

निठुर लोक में नहीं किसी ने
इनकी भी तह ली

- अश्विनी कुमार विष्णु
१५ जून २०
१६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter