अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

        धूप में होने लगा है ताब

 
धूप में होने लगा है ताब भी अब तेज
सूर्य अब होने लगा है
प्रात से ही तेज

घर में रहें आफ़त को’ कोई दे नहीं दावत
जीवन तो अपने हाथ इससे हो न अदावत
वक्‍त टल जायेगा इक दिन धैर्य जरूरी
पानी न हो कम तन में इससे ही मिले राहत
धूप के इस ताब से
करना सदा परहेज

गिर रहे हैं पात सूखे आजकल हर ओर
चल रही हरसू असहनीय लू पुरजोर
राह भरीं पात से पतझड़ ऋतु मानिंद
दूर है हर पेड़ पर नव पल्‍लवों का दौर
अब तपन अरु लाय से
बनने लगी है भेज

अब बसंती ऋतु को मिला ग्रीष्‍म का संदेश
भेजना पतझड़ सहित पातों का भी अवशेष
ना भड़क जाए अनल आए न झंझावात
अब हवा में हो रहा है लाय का प्रवेश
पात ना कोई जले
बनते यही सरखेज

- आकुल 
१ जून २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter