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        पीपल की छाया 

 
धूप दहकती साँस बन गई पग-पग अग्नि बिछाती है
सूखी धरती के अधरों पर प्यास किरन
मुस्काती है

ऐसे में पीपल की छाया चुपके बाँह पसारे है
थका हुआ मानव जीवन फिर शीतल स्वप्न सँवारे है
नीम तले दादी की बातें मन को
छाँव कराती है

घट की मिट्टी गंध बिखेरे जल जैसे वरदान लगे
छाजन नीचे बैठे चेहरे, अपनेपन की तान जगे
साँझ उतरते ही पछुआ भी सुख का
गीत सुनाती है

तपा हुआ है भले नवतपा जीवन रुकने वाला कब?
स्नेह-हवा के छोटे झोंके दे जाते नव साहस तब
झुलसे मन में छाई बदली हरियाली
भर जाती है

- डा. जितेन्द्र प्रसाद माथुर
१ जून २०२६

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