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        इस गरमी में  

 
इस गरमी में फिर जीवन ने
एक नयी खिड़की खोली है

यादों का समकोण पुराना
भावों का तल माप रहा है
मन की टूट-फूट का मंजर
सहनशीलता नाप रहा है

धड़कन की पहचान बचा लो
गली-गली दिल की बोली है

जो बीता वो रीता-रीता
उसको भरने देह गलाते
साँसों से मनुहार बहुत की
रहना साथी आते-जाते

संबल पाने कलम उठायी
पता चला वह खुद रो ली है

बूँद-बूँद मोती हो जाये
ऐसा सागर अब है होना
कहे आम की महक सुहानी
मीठा होगा अब हर कोना

ठंडी हवा रात से कहती
उठी चेतना की डोली है

- कुमार गौरव अजीतेन्दु
१ जून २०२६

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