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        पानी माँगे ताल  

 
सूखी नदियाँ झील पियासी पानी माँगे ताल
मौसम के सिर चढ़कर नाचे
फिर अगिया बेताल

उल्टी- सीधी शर्त लगाए नाचे दे- दे ताली
सुलग रहा है बिरवा-बिरवा झुलस रही हर डाली
ढूँढे मिले न उत्तर ऐसे
पूछे कठिन सवाल

मौन बस्तियों में पसरे हैं आतंकी सन्नाटे
आते- जाते हवा लगाती है लपटों के चाटे
सहमे गली और चौराहे
सुबक रहे चौपाल

झुलसे पंख लिये गौरैया दुबकी घर के कोने
टिके पेड़ से हांफ रहे हैं ये बेवस मृगछौने
मरी बिचारी सोन मच्छरिया
ऐसा पड़ा अकाल

चिंताओं की गठरी लादे धनिया खड़ी दुआरे
सोच रही है कैसे आँगन के दुःख- दर्द बुहारे
किसे दिखाये घाव हृदय के
किसे सुनाये हाल

- मधु शुक्ला
१ जून २०२६

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