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        गर्मियों के दिन  

 
उफ़ क़यामत लेके आते गर्मियों के दिन
किस क़दर है ज़ुल्म ढाते
गर्मियों के दिन

आज सूरज ने दिखाया रूप है विकराल
खौलते तालाब पोखर और नदिया ताल
अब हवा में भी समाते
गर्मियों के दिन

दिन है उबला रात भी आई दहकती सी
प्रातः भी आँखें तरेरे है भभकती सी
दुश्मनी सी हैं निभाते
गर्मियों के दिन

हो गया दूभर निकलना सबका है घर से
लग रहे लू के थपेड़े तन पे खंजर से
मच्छरों की फौज लाते
गर्मियों के दिन

तन तड़पता मन परेशां जी रहे जस तस
कर रही बिजली की आवा-जाही भी बेबस
रात दिन तन-मन जलाते
गर्मियों के दिन

- मंजू सक्सेना
१ जून २०२६

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