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        उजला सूरज

 
गरमी में उजले सूरज को
हमने जी भर बाँचा

उल्टी सीधी बातें कहकर था दुश्मन मान लिया
जी लेकर जायेगा सच में कुछ ने ये ठान लिया
तेज धूप के कारण ही तो दे दी जमकर गाली
मन मसोस बैठे थे घर में व्याकुलता थी पाली
सारी बातें ख़ारिज कर फिर
कसकर जड़ा तमाचा

नये गीत की खोज खबर भी नहीं मिल रही भाई
असहाय हो गये भाव सब और विचार हरजाई
अर्थ खो दिये हैं शब्दों ने झुलसे थे बेचारे
रौब दिखाकर दिन में सूरज दिखा रहा था तारे
ख़ामोशी के किले फतह कर
ढहा दिया था ढाँचा

जलने और सुलगने वाले आज बढ़े हैं आगे
मुट्ठी में आकाश बंद है संस्मरणों से भागे
सूखी सूखी घटनाएँ भी आज घटी राजधानी में
कच्चा चिट्ठा कच्चा था पर भीग गया पानी में
ये हैरत अंगेज तमाशा
हैरानी ने जाँचा

- श्रीधर आचार्य 'शील'
१ जून २०२६

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