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        तप्त सूरज

 
तप्त सूरज की किरण झुलसा रही है
अग्नि जैसे धरा पर बरसा रही है

जीव है विक्षिप्त तपती-सी धरा क्यों
तृषित जीवन तृषा से मानस भरा यों
आम्र मन्जरि पर कुहुकती कोकिला शुचि
स्वर सुभग शृंगार जीवन को मिला रुचि
भैरवी की तान को सरसा रही है

भानु किरणें चंचला स्व-स्नात लेतीं
धूप छाया खेलतीं सुर ताल देतीं
पिघलता हिम शिखर झिरझिर नीर की लय
शीत कानों में छलकती तृप्त तनमय
रजत दर्पण में निखर तरसा रही है

साँझ ने आ सप्तरंगी मद उड़ेला
रैन में सिमटा प्रकृति का आज मेला
गिर रही-सी यवनिका स्वर्णिम पटल है
ऊष्म बेकल वायु तो फिर भी अटल है
श्याम अम्बर ओढ़ रति हुलसा रही है
तप्त सूरज की किरण झुलसा रही है

- सुधा अहलुवालिया
१ जून २०२६

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