अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

        ग्रीष्म की सरगर्मियाँ   

 
दिन बिताना हो रहा मुश्किल बहुत
बढ़ रही हैं ग्रीष्म की सरगर्मियाँ

जिन्दगी बेहाल होती देखिए
बेबसी में चैन खोती देखिए
प्यास से व्याकुल हुई है हर जगह
दोपहर की धूप है इसकी वजह
मिल नहीं पाती सभी को छाँव जब
सूर्य की सहनी पड़ें
तब झिड़कियाँ

हर तरफ से तप रही दीवार है
और छप्पर हो रहा लाचार है
किन्तु कुछ पँहुचा सके राहत हमें
छाँव शीतल की बहुत चाहत हमें
है शिकायत नील नभ से भी बहुत
ले नमी छाती नहीं
क्यों बदलियाँ

तितलियाँ भँवरे हुए खामोश हैं
कर नहीं पाते मधुर उद्घोष हैं
कम बहुत ही गुनगुनाते हैं कभी
फूल खिलते मुस्कुराते हैं तभी
शाम को चलती कभी ठण्डी हवा
हैं तभी खुलती
अनेकों खिड़कियाँ

आम का पन्ना सभी को भा रहा
और कोई कुल्फियाँ है खा रहा
आम हैं तरबूज नींबू मिल रहे
देख जिनको चेहरे हैं खिल रहे
मान लें यह ऋतु परीक्षा ले रही
किन्तु कुछ आनंद
भी है दरमियाँ

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
१ जून २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter