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        सुआपंखी दिन

 
रंगतें लेकर सुआपंखी
आ गये हैं क्वार के ये दिन
गंध भीगे प्यार के ये दिन

जा रहे लेकर
विदा बादल, छोड़ कर डेरे दिशाओं के
बोल फिर लगने लगे मीठे गुनगुनाती इन हवाओं के
हरसिंगारी हो गई रातें कुमकुमी
भिनसार के ये दिन

सज गई हैं
कास फ़ूलों की झालरे फैले सिवानों में ।
लौट आईं हलचलें फिर से इन परिंदों की उड़ानों में
महमहाती धान की फसलें मौसमी
उपहार के ये दिन

कर रहें हैं
सूर्य का स्वागत मुस्कराते कमल के ये दल
सीढिया फिर घाट की चढ़कर उतर आया है नदी का जल
फिर सजाये दीप अंजुरी में आ गये
त्यौहार के ये दिन

उतर कर फिर
आसमानों से आ गई नौ देवियाँ भूपर
हर तरफ है झाँकियाँ उत्सव और गरबा डांडिया के स्वर
आस्थाओं के समन्दर में उठ रहे
फिर ज्वार के दिन

- मधु शुक्ला 
१ अक्टूबर २०२६

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