अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

होली है!!


वो हल्का सा गुलाल


आँखों की
जलती बुझती रौशनी के बीच
कहीं
वो हल्का सा गुलाल-
क्षितिज के
मद्धम से अँधेरों को
अपने में समेटे
चाँद की पेशानी पर
चमचमाता अबीर बनकर
हर पूनम को सुलगता है।

आस लगाये बैठी हूँ
उस होली की सुबह का
जब ये चाँद पूनम से उतर कर
अमावस के गुलाल में
सितारे भरकर
मेरे मन के अंधेरों की पेशानी पर
इन्द्रधनुष सा
रौशन होगा।

मेरा जीवन
अँधेरों से बने उजालों के
एक अथाह सागर में
भीगा होगा।

-मीना चोपड़ा
२५ मार्च २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter