अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

होली है!!


फागुन


पुनः
समय की आँखों में है
महुआया फागुन

पोर-पोर सरसों पियराई
खुशबू की काया अँगड़ाई
साँझ – सकारे
सगुन पखेरू
बाँच रहे निर्गुन

फिर फूले पलाश - वन दहके
बाग, बघारे, खेत, घर महके
बौरों का
पाहुर लेकर
आया मौसम पाहुन

है बरसात मदिर गंधों की
प्रेमगीत के स्वर-छंदों की
मन मे जमी
मैल धो देंगे
शब्दों के साबुन

-नचिकेता
२५ मार्च २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter