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होली है!!


फाग के दिन


बात या
बिन बात के मुस्कान पहने
तिर रहे हैं फाग के दिन

हैं पलाशों के
घरों मेंरंग की छिटकारियाँ
गुलमोहर ने सुर्ख़ियों की
खोल दीं अलमारियाँ
आम के बौरों पे मोती से चमकते
गिर रहे हैंफाग के दिन

पूरबी झोंके
चले हैं घेर कर पगडंडियाँ
खोलते घूँघट सताएँ
कर रहे अठखेलियाँ
त्यौंरियों को देख हँसते खिलखिलाते
फिर रहे हैं फाग के दिन

गठरियाँ ले
याद की गुपचुप कहीं बैठे बिछोड़े
भंग की मस्ती चढ़ाए
हैं मिलन ने बाँध तोड़े
चटक-धूसर रंग के घेरों में खुद भी
घिर रहे हैं फाग के दिन

-सीमा अग्रवाल
२५ मार्च २०१३

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