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साल में इक दिन

धड़कते हैं मुसलसल दिल, लहू बहता शिराओं में।
उड़े मकरन्द बौराता बहे खुश्बू हवाओं में।

पलासों पर जवानी हो, जहाँ खुद आग हो सेमल
झुके हों पेड़ महुए के, भरा यौवन लताओं में।

जहाँ वन बाग में कलियाँ, रिझातीं हों भ्रमर को खुद
किलोलें कर परिंदे भी लुभाते हों अदाओं में।

जहाँ रति काम खुद आकर मनाते हैं, सताते हैं
जहाँ सौभाग्य का वरदान मिलता हो दुआओं में।

जहाँ पर रास होते हों, हुयी हों कृष्ण लीलाएँ
थिरकते पाँव मादल पर, पले मस्ती दिशाओं में।

वहाँ पर इश्क की खातिर भला क्या दिन मुक़र्रर हो
जहाँ ऋतुएँ नशीली हों घुला हो मद फजाओं में।

- हरिवल्लभ शर्मा 'हरि'
१ मार्च २०१७

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