अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

 

                        .
             
     फागुन मुझे बुलाता है
  .
वह फागुन मुझे बुलाता है

जो फागुन बसता गाँवों में
बागों की खिली अमराई में
कलियों में फूलों में बिहँसे
सरसों की नवल तरुणाई में
मँडराती उड़ती तितलियों के
रंगों में घुला इतराता है
वह फागुन मुझे बुलाता है

मेरा फागुन घर-आँगन में
चूनर में रंगा नाचे गाए
वह इंद्रधनुष सा घटे-बढ़े
मेहों सा झूम बरस जाए
बिन मौसम औ' बिन ऋतुओं के
जन-जीवन जो हर्षाता है
वह फागुन मुझे बुलाता है

एक फागुन है मन में मेरे
जो कण-कण में रस रंग भरे
अभिनंदन को हुलसित वसुधा
निज हाथों से शृंगार करे
लेकर गुलाल जो होली में
मेरे घर चलकर आता है
वह फागुन मुझे बुलाता है

- जिज्ञासा सिंह
१ मार्च २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter