अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

 

                         .
                
  बरसाने की गलियों में
  .
फागुन की रुत लौट के आई
बरसाने की गलियों में
हुरियारों ने धूम मचाई
बरसाने की गलियों में

चुहल-चिरौरी मान-मनौवल
संकेतों में बात करें
हँसी-ठिठोली बीच बजरिया
नयनों से संवाद करें
भाँग चढ़ी फिर उतर न पाई
बरसाने की गलियों में
फिरें बाँवरे करें ढिठाई
बरसाने की गलियों में

जित देखूँ उत राधे- कान्हा
और न कोई रूप वहाँ
सतरंगी बौछारें बरसें
सोन नहाई धूप वहाँ
मस्त हवा झूमे बौराई
बरसाने की गलियों में
कचनारों की खुशबू छाई
बरसाने की गलियों में

होरी-चैती फाग सुरीले
फगुआरों की टोली में
ढोल मंजीरे बजे बांसुरी
भीजे तन-मन रोली में
नंदगाँव की रीत निभाई
बरसाने की गलियों में
रंग रंगीली होली आई
बरसाने की गलियों में
.
- शशि पाधा 
१ मार्च २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter