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      रंग उड़ाती टोलियाँ
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चलो हम- तुम खेल
लें होली!

पहन कर फिर गंध के गहने
हवा वासंती लगी बहने
खो गया था जो कहीं पर मन
फिर उसे अब मैं लगा गहने
हो रही सुनगुन शिराओं में
कूक कर कोयल
कहीं बोली!

पुण्य तो कुछ है किया मैंने
तुम्हें मन से वर लिया मैंने
सात वचनों को निभाया है
सात रंगों को जिया मैंने
चलो रंग लें आज हम तन-मन
द्वार पर दो
बना रंगोली!

ऋतु गुलाबी हो गई न्यारी
खिली फूलों से भरी क्यारी
आ गुलालों से तुम्हे भर दूँ
चलो मारो तुम भी पिचकारी!
कौन रोकेगा किसे इस दिन
मच गई है
देख रंगरेली!

- उदयशंकर सिंह 'उदय' 
१ मार्च २०२६

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