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       कैसे हरूँ मुरलिया
 

 
वंशीधर की जब-जब वंशी, कमर दुपट्टे बँधती
ग्वाल-बाल चिंतित होते, होनहारिनी हँसती
जब कृष्ण के मोरमुकुट का, मोरपंख लहराता
दूरदृष्टि का द्योतक चाँदा, सबको धैर्य बँधाता

कान्हा ने जब नाग कालिया, नाथा, सबक सिखाया
यमुना तट पर जुटी भीड़ का, उखड़ा मन हरषाया
आगे चलकर कृष्ण-मुर* की, जमकर हुई लड़ाई
टूटी वंशी गिरी धरा पर, राधा ने खुशी मनाई

मार असुर को गोपाला जब, नामित हुए मुरारी
श्री कृष्ण के ओंठों चहकी, मुरली की स्वरलहरी
राधा ने जल-भुनकर कोसा, कहा कृष्ण को छलिया
लगी सोचने वह यमुना तट, कैसे हरूँ मुरलिया

*मुर राक्षस

- लक्ष्मी नारायण गुप्त
१ सितंबर २०२६

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