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       माखन चुराता श्याम

 

देखा जब गोपियों ने माखन चुराता श्याम,
लगा प्रेम-रोग श्याम-श्याम रटने लगीं।
माखन-मलाई के बहाने घर में बुलाके,
श्याम संग प्रेम की मथानी मथने लगीं।
रास का रचैया मेरा साँवरा कन्हैया कह,
बार-बार प्रेम की नदी में बहने लगीं।
किंतु घनश्याम जब मथुरा-निवासी हुए,
प्रेम-ताप में ही गोपिकाएँ जलने लगीं।

वन में बजी तो वन-लतिका के साथ-साथ,
ब्रज-वनिता का संतूर बनी बाँसुरी।
गोपियों की श्वास, लय-ताल-छंद में बसी तो,
प्रेम की प्रभा से भरपूर बनी बाँसुरी।
सबको नचाती रही अपनी ही धुन पर,
मानो जन-मन की मयूर बनी बाँसुरी।
गोपियों का नूर-कोहिनूर बनी बाँसुरी तो,
सौत बनी बाँसुरी, सिंदूर बनी बाँसुरी।

आँसुओं से यमुना में बाढ़ जैसी आ गई थी,
ब्रजवासी 'लौट आओ श्याम' लिखने लगे।
फूल हो गए बबूल, मधुवन सूख गया,
खेत औ' किसान त्राहिमाम लिखने लगे।
राक्षसों का झुंड ग्वाल-बाल को सताने लगा,
ग्वाल-बाल रक्षा-इंतज़ाम लिखने लगे।
गोरी-गोरी गोपियों के काले-काले नैन झर,
प्रेम का मिला जो परिणाम लिखने लगे।

- डॉ. मंजुलता श्रीवास्तव
१ सितंबर २०२६

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