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       गिरधर गोपाल

 
शिशुपालों की गालियाँ, पहुँच चुकीं शत पार
कहाँ छिपे हो कृष्ण, क्यों कुंद सुदर्शन-धार

क्रंदन करें बालाएँ, दुर्जन फिरें स्वच्छंद
चीर-हरण अब बंद हो, हे गिरधर सुतनंद!

गिरधर आओ ढूँढ़ लो, वही ललित ब्रज-गाँव
क्रूर विकास ने जिसको, कुचल दिया धर पाँव

विवश बहुत है द्रौपदी, माधव सुनो पुकार
दुःशासन हैं घूमते, गाँव-गली-बाजार

मुक्त विचरते असुर-जन, दुर्जन, अधम, स्वतंत्र
अपना राग अलापते, स्वार्थ सभी का मंत्र

विदुर देश के मौन हैं, फैल रहा है पाप
बढ़े प्रेम, सौहार्द फिर, आओ गिरधर आप

आओ युग-प्रवर्तक हरि, करने को उद्धार
सारथि-मार्गदर्शक बन, देना राह बुहार

उफने पोखर-ताल सब, वर्षा थी घनघोर
रह-रह कड़के दामिनी, अंबुद करते शोर

माह भाद्रपद अष्टमी, प्रकोष्ठ-कारागार
कृष्ण अवतरित जब हुए, निशा सघन अँधकार

कटि में साजे करधनी, मोरमुकुट उर माल
मुख लपेट नवनीत-दहि, ठुमक-ठुमक सी चाल

गोवर्धन धारण किया, इंद्र-गर्व कर चूर
पाँव पैजनी बज उठी, नयनों चमका नूर

कंस-पाप अरु पाखंड, किया जगत से दूर
मारा विषधर कालिया, असुर अनेकों क्रूर

गीता में श्रीकृष्ण के, ज्ञान की यही नींव
मृत्यु का भय व्यर्थ है, अजर-अमर जब जीव

कुछ लेकर आए नहीं, जाना खाली हाथ
संग न आया कोई जब, होगा कौन अनाथ?

- ओम प्रकाश नौटियाल
१ सितंबर २०२६

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