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अनूठे कृष्ण |
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तब भी बरगद से लगते थे
जब थे बूटे-बूटे कृष्ण
एक बाँसुरी सात सुरों को
सोचो कैसे साधे थी
चिन्तन और चेतना की लय
जड़-चेतन को बाँधे थी
कभी कृष्ण से बँधीं गोपियाँ
कभी कृष्ण से छूटे कृष्ण
अनुपम प्रीति-रीति के प्रेरक
राजनीति के युग द्रष्टा
सहयोगी, सारथी, सहोदर,
सखा-भावना के सृष्टा
योगेश्वर बनने में आखिर
होंगे कितना टूटे कृष्ण
जुड़ा रहा है जो माटी से
उस पर तंज सहें कैसे
श्वेत क्रांति के उनायक को
माखन-चोर कहें कैसे
कुछ भी समझें दुनिया वाले
लेकिन रहे अनूठे कृष्ण
- डॉ. अशोक 'अज्ञानी'
१ सितंबर २०२६ |
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