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       कृष्ण कन्हैया

 
बजा रहा है मोर बाँसुरी
छप्पक छैया खेल रहे हैं
कृष्ण कन्हैया
बजा रहा है मोर बाँसुरी
नाचे गैया

भरी सड़क है उजड़ी-पुजड़ी
मित्रों की है भीड़ बड़ी
कोई फिसले, उछले कोई
हँसें गोपियाँ खड़ी-खड़ी
राधा रानी किए जा रहीं
ता-ता थैया

फूटा घुटना बलदाऊ का
रोएँ भल-भल आँखें मल
पानी झम-झम बरस चुका है
सड़कें तर हैं, गड्ढे गल
कान्हा-बलदाऊ को ढूँढ़ें
जसुदा मैया

सुन ले ओ इस जग के राजा
गड्ढा भर कर सड़क बना
वरना आते हर चुनाव में
चबवा देंगे नाक-चना
फिर न तुम बरखा देखोगे
ना पुरवैया

- जिज्ञासा सिंह
१ सितंबर २०२६

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