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       कृष्ण मैं मंदिर तेरा

 
कृष्ण मैं मंदिर तेरा
आराधना अविराम है

गर्भगृह मेरे हृदय में
शीश गुंबद-सा तना
नेत्र बनते हैं कपाटें
भावों का उपवन घना
भक्तिमय हैं क्षण सभी
यह रात-दिन का काम है

गीत मेरे ग्वाल हैं
हर गीतिका है गोपिका
छंद तेरी बाँसुरी
अतुकांत में भी ब्रज दिखा
शब्द वृंदावन दिखाते
द्वारका हर शाम है

चेतना गीता बनी है
पार्थ-जिज्ञासा लगे
हर प्रतिज्ञा भीष्म लगती
राधिका उर में पगे
हैं चँवर साँसें डुलातीं
कर्म जपता नाम है

- कुमार गौरव अजीतेन्दु
१ सितंबर २०२६

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