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       लीला पुरुष

 
तुम हो
लीला पुरुष
और मैं लीला कृष्ण तिहारी

अंतर्मन रंग गई एक दिन
एक साँवली छाया
दमक उठी कंचन आभा-सी
सब मटमैली काया
सगुन-सगुन
हो गई समूची
अवगुन भरी पिटारी

नीलांबुज चरणों में बैठी
जब भी गहन निराशा
सूर्योदय नवनीत-शिशु बन
देहरी लाया आशा
आँचल भरा
यशोदा माँ-सा
घर गोकुल गिरधारी

मोरपंखिया ध्यान ज्ञान का
अंतर्मुखी उजाला
एक अलौकिक दीपशिखा ने
तिमिर-मुक्त कर डाला
तन वृंदावन
तीरथ न्यारा
मन में बसे बिहारी

- रमेश गौतम
१ सितंबर २०२६

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