अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

       आओ कान्हा, फिर से आओ

 
सूनी-सूनी मन की गलियाँ फिर से आज सजाएँ
माखन जैसी मीठी बोली घर-घर कृष्ण सुनाएँ
मुरली की वह तान सुनाकर मन के द्वार जगाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

यमुना मैली, मैला मन है मैला हुआ उजाला
नफ़रत के विषधर फन काढ़े हर ओर विषम ज्वाला
प्रेम-सुधा की धार बहाकर धरती को नहलाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

बच्चों की आँखों में सपने बूढ़ों में विश्वास
भटके युवा तलाश रहे हैं जीवन का आकाश
गीता का संदेश सुनाकर कर्म-पथ पर लाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

टूट रहे हैं रिश्ते सारे स्वार्थ हुआ सिरमौर
अपने ही अपनों से रूठे मन में उठता शोर
राधा जैसा प्रेम जगाकर मन का दर्द मिटाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

अंधियारे के बीच कन्हैया दीप बनो विश्वास
भारत की इस पुण्य धरा पर फिर गूँजे उल्लास
धर्म नहीं मानवता का तुम नूतन पर्व मनाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

- संजय सुजय बासल
१ सितंबर २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter