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       हर हृदय जमुना विकल है

 
चेतना की नाव कान्हा जी लगाओ पार
हर हृदय जमुना विकल है
क्लिष्ट है व्यवहार

जग हुआ है कालिया
जीवन नधा-सा है
धैर्य की जमुना हुई है राग से भारी
देह की नस-नस पिराती
क्या भरोसा दे
झेल भी पाए भला क्या उम्र की पारी
कुंद है विश्वास सारा
मौन हैं उद्गार
हर हृदय जमुना विकल है
क्लिष्ट है व्यवहार

चल पड़े हैं दाँव भी संसार में ऐसे
हार हो या जीत हो
कुछ फ़र्क़ पड़ता क्या?
कौन अपना, क्या पराया
सब तमाशा है
जब महाभारत रुचे
हड़बोंग-जड़ता क्या?
रात-दिन झुँझला रहा मन
हो रहा खूँखार
हर हृदय जमुना विकल है
क्लिष्ट है व्यवहार

पूतना की सोच से जब
गोद हो भारी
और अभिभावक बकासुर-भाव के धारक
नीतियाँ या न्याय ही कुछ तो प्रभावी हों
बोझ नियमों के स्वयं
अपराध के कारक
देह-भाषा से पगी है
बावली चीत्कार
हर हृदय जमुना विकल है
क्लिष्ट है व्यवहार

- सौरभ पाण्डेय
१ सितंबर २०२६

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