अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

जनतंत्र हमारा 
 जनतंत्र को समर्पित कविताओं का संकलन 

 
 
देश कहाँ है
 

देश कहाँ है?
अब तो यह बाजार हो गया

घूम घूम कर
मुखिया जी तो ग्राहक ढूँढ रहे
और यहाँ घर वाले
उनकी मटकी फोड़ रहे

संसद भी तो
अब मछली-बाजार हो गया

काम करेंगे
गधे हमारे सीधे सादे हैं
भूखे हैं पर
देखो कितना बोझा लादे हैं

डॉलर फेंको
देखो वो तैय्यार हो गया

सुनो शाह जी
बहुत दिनों से इधर नहीं आये
सोने की चिड़िया
बैठी है कब से मुँह बाये

हड्डी का पिंजरा
देखो बीमार हो गया

आओ बाजारों तक
बिल्कुल सड़क साफ़ है
थूको उस पर
चाहे जितना तुम्हें माफ़ है

थूक हटाना
अपना कारोबार हो गया

- डॉ. प्रदीप शुक्ल
१० अगस्त २०१५


इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter