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ज्ञानवती दीक्षित की
मुकरियाँ |
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१
मुझको वह प्राणों से प्यारा
दिखलाता रंगीन नजारा
कौन भला उसके समकक्ष
क्या सखि साजन? ना सखि ‘वृक्ष’
२
वो मेरा जाना पहचाना
मौसम उससे रहे सुहाना
मैं चाहूँ वह रहे समक्ष
क्या सखि साजन? ना सखि ‘वृक्ष’
३
मुझको लगे वही भगवान
मैं तो उस पर हूँ कुर्बान
उसके दुश्मन कुछ कमबख्त
क्या सखि साजन? नहीं ‘दरख्त’
४
सारी रात मचाये शोर,
मन करता हो कभी न भोर,
लगे अमावस भी मतवाली,
क्या सखि साजन?
नहीं 'दिवाली'
५
बदन इकहरा है संगीन,
है स्वभाव से वह रंगीन,
उसके संग रहें शुभ घड़ियाँ,
क्या सखि साजन?
ना 'फुलझड़ियाँ'
- हरिओम श्रीवास्तव
१ अगस्त २०२६ |
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