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हरिशंकर मिश्र सौभद्र की मुकरियाँ

 


मिटी तपिश वह जब से आया
अंग - अंग मेरा मुस्काया
भीगी चोली भीगा दामन
के सखि साजन?न सखि सावन

सारे जग में पिटा ढिंढोरा
नट-खट पागल श्यामल छोरा
उसकी प्रीति लगी मनभावन
के सखि साजन?न सखि सावन

उसने आकर जल बरसाया
विरहन मन का ताप बढ़ाया
नित जलती मैं बिना जलावन
के सखि साजन?न सखि सावन

वह अम्बर का सीना फाड़े
ऐसे रह - रह खूब दहाड़े
कभी बजावे लेकर मादल
के सखि साजन?न सखि बादल

सारा जग उससे अब ऊबा
घर आँगन सबका है डूबा
गर्जन सुनकर काँपे हाड़
के सखि साजन?न सखि बाढ़

- हरि शंकर मिश्र "सौभद्र"
१ अगस्त २०२६

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