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जिज्ञासा सिंह की मुकरियाँ

 


आधा गोरा आधा काला
रूप बदलता गड़बड़झाला
मुझे देख मुस्काता मंद
क्या सखि साजन? ना सखि चंद

सुन्दर मुंदर गोल मटोल
आया चार दिशाएँ डोल
उसे देख जाती मैं हँसि
क्या सखि साजन? ना सखि शशि

जग सोता वो तब है आता
देख भोर एकदम छुप जाता
रातों का शैतान परिंदा
क्या सखि साजन? ना सखि चंदा

बड़ी अनोखी उसकी सज्जा
देख मुझे पर आए लज्जा
रात्रि समय करता आदाब
क्या सखि साजन? ना महताब

दिखे सदा छत पर नादान
घूमे खेत और खलिहान
भर लूँ उसको अपने अंक
क्या सखि साजन? नहीं मयंक

मन के भीतर है रहता वो
अक्सर सबको है दिखता जो
जब दिल चाहे बदले भेष
क्या सखि साजन? ना राकेश

दिखा शकल फिर गायब वो
ऐसे रोज चिढ़ाता है जो
भौहों बीच सजा वो बिंदु
क्या सखि साजन? ना सखि इंदु

- जिज्ञासा सिंह
१ अगस्त २०२६

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