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ज्योत्सना शर्मा की मुकरियाँ

 


मस्त हवा मस्ती में झूमें
झट मेरे गालों को चूमें
झुककर मेरी मूँदें पलकें
क्या सखि साजन? ना सखि अलकें

कभी बताता पतली, मोटी
हूँ कितनी लम्बी या छोटी
बहस करूँ ना जाए जीता
क्या सखि साजन? ना सखि फीता

गीत, रुबाई, ग़ज़ल सुनाए
विविध विधा से मन सरसाए
हृदयहार, माथे की बिंदी
क्या सखि साजन? ना सखि "हिंदी"

साँझ ढले से मुझे बुलाए
सुख सपनों की सैर कराए
गोलूमोलू तन मन बसिया
क्या सखि साजन? ना सखि तकिया

उसपर अपनी जान लुटा दूँ
उसकी खातिर जहाँ भुला दूँ
भरे भाव की पावन गंगा
क्या सखि साजन? नहीं तिरंगा


मधुर भाव है बड़ा रसीला
करे कभी नयनों को गीला
जाने महफिल खूब जमाना
क्या सखि साजन? ना सखि गाना


देखा-देखी सीटी मारे
कभी राम का नाम उचारे
कितना खुशदिल कभी न रोता
क्या सखि साजन? ना सखि तोता


बने बड़ों का कभी सहारा
उसने सब दुष्टों को मारा
पतली? लम्बी है कद-काठी
क्या सखि साजन? ना सखि लाठी

घन गरजें तो मस्ती छाए
झूम-झूमकर नाचे जाए
खूब पुकारे करता शोर
क्या सखि साजन? नहीं सखि मोर

१०
साँझ ढले आँगन में आए
मैं बैठी थी दीप जलाए
बाहों में लेने से हारा
क्या सखि साजन? ना अँधियारा

- ज्योत्सना शर्मा
१ अगस्त २०२६

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