अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

कविता काव्या सखी की मुकरियाँ

 


उषा पूर्व ही वह जग जाता
वह ही मुझको नित्य जगाता
अति मुस्तैद लगे ज्यों गुरगा
ऐ सखि साजन? नहिं सखि मुर्गा


सखी रात को वह बतियाता
उसका रूप मुझे है भाता
सुबह तोड़ जाए पर फंदा
ऐ सखि साजन? नहिं सखि चंदा


कभी शांत वह कभी गरजता
हिय में जाने क्या-क्या रखता
देता खुशियाँ निकट बुलाकर
ऐ सखि साजन? नहिं सखि सागर


उसे लिये जब मैं हूँ सोती
मीठे सपनों में मैं खोती
बीते उस सँग मेरी रतिया
ऐ सखि साजन? नहिं सखि तकिया


दिन में उसका साथ अधूरा
साथ रात में देता पूरा
सुख देता उसका नित संग
ऐ सखि साजन? नहीं पलंग


सखि वह मेरा है आभूषण
उसके प्रति मन में आकर्षण
करे प्रथुल चोटी सँग खेला
ऐ सखि साजन? नहिं सखि बेला


तन-मन को वह तर कर देता
सँग उसका चुस्ती भर देता
लगी मुझे तो उसकी आदत
ऐ सखि साजन? नहिं सखि शर्बत


रूप सुहावन मन अनुकूल
देख उसे सब जाती भूल
लगा दुखों में सखी हलंत
ऐ सखि साजन? नहीं बसंत


देकर वह आवाज बुलाता
कभी-कभी सुर में वह गाता
कभी टेर लगती ज्यों भाला
क्या साजन? ना सब्जी वाला

१०
उसे देख बाहें फैलाऊँ
उसके साये में सुख पाऊँ
हो जाता दिल मेरा गद्गद
ऐ सखि साजन? नहिं सखि बरगद

- कविता काव्या सखी
१ अगस्त २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter