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      डॉ मधु प्रधान की मुकरियाँ

 


उसके साथ चाय भी भाए
सारे जग का हाल बताए
मुझको उससे हो गया प्यार
क्या सखि साजन? ना अखबार


उसके बिन कुछ भी ना भाये
मिले नहीं तो कल न आये
याद दिलाये हमको नानी
क्या सखि साजन? न सखि पानी


रूप सजीला मुझको भाये
हार गले का वह बन जाये
वह मेरे मन की है ज्योती
क्या सखि साजन?न सखि मोती


वह आये तो मन लहराये
श्यामल-श्यामल छवि मन भाये
जैसे हो नयनों का काजल
क्या सखि साजन ?न सखि बादल


आना-जाना सरल बनाये
दुनिया भर की सैर कराये
उसके बिन सब कुछ बेकार
क्या सखि साजन? न सखि कार

- मधु प्रधान
१ अगस्त २०२६

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