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      डॉ मंजु गुप्ता की मुकरियाँ

 


जिसकी सुंदर लिपि मनुहारी
जन जन को वह लगती प्यारी
जिसके माथे सोहे बिंदी
क्या सखि नारी, ना सखी हिंदी


नील गगन पर वह नित मटके
चमक दमक से दुनिया चमके
देख उसे हो मन आनंदा
क्या सखि साजन ?न सखि, चंदा


जब भी बाहर को मैं जाती
जब भी बाहर से मैं आती
चलता मेरे संग निपूता
क्या सखि साजन? ना सखी जूता


उसको देखूँ छाए लाली
खुशियों की लाए उजियाली
देख उसे खिलता मन नीरज
क्या सखि साजन? ना सखि, सूरज


पाँच तत्व में उसकी महिमा
जीवन भर है उसकी गरिमा
प्राणों को दे यह जीवन बल
हे सखि साजन, ना सखि जल


उसकी श्यामल छवि मन भाए
आशाओं के पंख लगाए
देख उसे मेना मन हर्षा
क्या सखि साजन? ना सखि वर्षा


रूप बावरा गोरी काया
चमके-दमके उसकी माया
आँख मिचौली करे कामिनी
क्या सखि साजन, नहीं दामिनी

डॉ. मंजु गुप्ता
१ अगस्त २०२६

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