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निरुपमा सिंह ढाका की मुकरियाँ

 


कागज़ पर भाव उकेरे
मन के सारे भेद ये खोले
बिन बोले कथा सुनाए
ऐ सखि दर्पण?
ना सखि कलम


न रंग उसका न आकार कोई
फिर भी करता जीवन साकार वोही
साँस-साँस में रहता बस कर
ऐ सखि सुगंध?
ना सखि प्रेम


बरसे तो धरती मुस्काए
रुक जाए तो मन अकुलाए
जीवन का आधार वही है
ऐ सखि अमृत?
ना सखि मेघ


सबके घर में रोज़ ही जाए
फिर भी कोई रोक न पाए
आते-जाते उम्र चुरा ले
ऐ सखि चोर?
ना सखि समय


रात अंँधेरी संग में आया
चुपके-चुपके दीप जलाया
भोर भई तो कहीं न पाया
क्या सखि चाँद?
ना सखि सपना

- निरुपमा सिंह ढाका
१ अगस्त २०२६

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