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ओमप्रकाश नौटिलाल की
मुकरियाँ |
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१
सुन सुन कर ले, तन मन हिलोर
होता श्रोता, विस्मृत विभोर
बहे जब मुख से शब्द सरिता
क्या सखि साजन?
ना सखि कविता
२
द्द्श्य कल्पनातीत कोष से
भयाक्रांत, ना रहा होश में
किसने किया हाल यह अपना
क्या सखि साजन?
ना सखि सपना
३
वैसे तो यह हर विपद हरे
जब क्रोधित हो, विध्वंस करे
हमको पाला, हर कष्ट हरा
क्या सखि साजन?
नहीं सखि धरा
४
यादें जिसकी तड़पाती हैं
मन मंदिर में छा जाती हैं
जो है समय के ही विपरीत
क्या सखि साजन?
ना सखि अतीत
- ओम प्रकाश नौटियाल
१ अगस्त २०२६ |
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