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परमजीत कौर रीत की मुकरियाँ

 


देखूँ जिधर, उधर ही देखे
पढ़ लेता वह मेरे लेखे
लगता है वह एक करिश्मा
क्या सखि साजन? न सखी चश्मा


दिनभर रहता आता-जाता
पुरवाई का है वह भ्राता
जब तब रो पड़ता है पागल
क्यों सखि साजन? न सखी बादल


मुझे नींद में आन सताता
कभी हँसाता कभी डराता
रूप बदलता रहता अपना
क्यों सखि साजन? न सखी 'सपना'


ठंडक उसको ज़रा न भाए
गुस्से में बस तपता जाए
बिगड़े तो लगता है चीटर
क्यों सखि साजन? न सखी हीटर


बचपन से है उससे नाता
उसका साथ मुझे है भाता
रहे सामने सोऊँ जब तक
क्यों सखि साजन? न सखी पुस्तक


उसको पाकर जीवन पाऊँ
उस बिन तड़प-तड़प मर जाऊँ
वह पत्थर पर लिखे कहानी
क्यों सखि साजन? न सखी पानी


मेरे आगे-पीछे चलता
किन्तु अँधेरे से है डरता
अभी छिपा था, लो अब आया
क्या सखि साजन? न सखी साया

- परमजीत कौर 'रीत'
१ अगस्त २०२६

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