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शशि पुरवार की मुकरियाँ

 


सुबह सवेरे रोज जगाये
नयी ताजगी लेकर आये
दिन ढलते, ढलता रंग रूप
क्या सखि साजन?
नहीं सखि धूप


साथ तुम्हारा सबसे प्यारा
दिल चाहे फिर मिलूँ दुबारा
हर पल बूझूँ? एक पहेली
क्या सखि साजन?
नहीं सहेली


रोज रात-दिन साथ हमारा
तुमको देखें दिल बेचारा
पल पल देखू उसको खड़ी
क्या सखि साजन?
ना सखी घडी


तुमसे ही संसार हमारा
मिले नहीं तो दिल बेचारा
पाकर उसे हुई धनवान
क्या सखि साजन?
नहीं सखि ज्ञान

- शशि पुरवार
१ अगस्त २०२६

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