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त्रिलोक सिंह ठकुरेला की मुकरियाँ

 


चमक दमक पर उसकी वारी
उसकी चाहत सब पर भारी
कभी न चाहूँ उसको खोना
क्या सखि, साजन? ना सखि, सोना


पाकर उसे फिरूँ इतराती
जो मन चाहे सो मैं पाती
सहज नशा होता अलबत्ता
क्या सखि, साजन? ना सखि, सत्ता


मैं झूमूँ तो वह भी झूमे
जब चाहे गालों को चूमे
खुश होकर नाचूँ दे ठुमका
क्या सखि, साजन? ना सखि, झुमका


जब आये, रस-रंग बरसाये
बार बार मन को हरसाये
चलती रहती हँसी-ठिठोली
क्या सखि, साजन? ना सखि, होली


बिना बुलाये, घर आ जाता
अपनी धुन में गीत सुनाता
नहीं जानता ढाई अक्षर
क्या सखि, साजन? ना सखि, मच्छर


उससे जीवन सुखमय चलता
वह न रहे तो जीवन खलता
कैसे कहूँ कि रिश्ता कैसा
क्या सखि, प्रेमी? ना सखि, पैसा


करता हरित, लुटा खुशहाली
भरता मन की गागर खाली
मेरे लिए बहुत मनभावन
क्या सखि, साजन? ना सखि, सावन


धन, आभूषण, सुख से भरता
मुझको मन की रानी करता
मुझ पर करता जादू अपना
क्या सखि, साजन? ना सखि, सपना


कभी पकड़ता वह बालों को
कभी चूम लेता गालों को
मैं खुश होकर देती ठुमका
क्या सखि, साजन? ना सखि, झुमका

१०
उससे सटकर, मैं सुख पाती
नई ताजगी मन में आती
कभी न मिलती उससे झिड़की
क्या सखि, साजन? ना सखि, खिड़की

११
जैसे चाहे वह तन छूता
उसको रोके किसका बूता
करता रहता अपनी मर्जी
क्यों सखि साजन? ना सखि, दर्जी

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
१ अगस्त २०२६

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