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उदय शंकर सिंह उदय की मुकरियाँ

 


जब डोले तो सन सन बोले
नाचे तो बाँहों को खोले
घूमे हर पल होकर चंगा
क्या सखी साजन? ना सखी- पंखा


चमके जैसे झलमल मोती
झलके जैसे श्वेत कपोती
धूप लगे हो जाय बेहोश
क्या सखी साजन?ना सखी ओस


चोट पड़े तो ता- धिन बोले
अंगुलियों से रस को घोले
मारे नहले पर ले दहला
क्या सखी साजन? ना सखी तबला


श्याम रंग है बदन पनीला
उमड़- घुमड़ दिखाये लीला
ले आये भर- भर शीतल जल
क्या सखी साजन? ना सखी बादल


घूम घूम कर सुर में गाता
पत्थर दिल भी गीत सुनाता
खुद भूखा रह हमें खिलाता
क्या सखी- साजन? ना सखी-- जाँता

- उदयशंकर सिंह 'उदय '
१ अगस्त २०२६

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