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प्रो. विश्वंभर शुक्ल की मुकरियाँ

 


रंग बिरंगी सबको भाये
कुछ करने को मन ललचाये
मीठी-मीठी प्रीति जगाए
ए सखि चोली, ना सखि होली


साधे सब पर खूब निशाना
सराबोर होकर ही जाना
लेती सबकी खबर करारी
ए सखि नारी, ना पिचकारी


हिरदय बसी कृष्ण की प्यारी
सुमिरन करती दुनिया सारी
गुण अवगुण सब उसने साधे
क्या सखि यशुदा ना सखि राधे


गाल गुलाल रँगे, मुस्काये,
कोई उसको रोक न पाए,
पीछे- पीछे छोरा छोरी,
ए सखि कान्हा, ना सखि गोरी


रस से भरी घुमाए चक्कर
रखो अधर तो पाओ शक्कर
है उसकी पहिचान फरेबी
क्या प्रिय सजनी, नांहि जलेबी


आवै ना तो पड़े न चैना
उसकी राह तकें ये नैना
घर आवै जब उगे दिवाकर
का सखि साजन ना सखि चाकर


चटक धूप या पानी बरसे
उसकी आहट पर मन हरसे
घरवालों को चाहत गहरी
क्या सखि साजन,नहिं सखि महरी


प्यास बुझाए शीतल जल से
हर्षित कर देता कल-कल से
सबका प्रिय लेकिन है छोटा
क्या सखि साजन, नहिं सखि लोटा


कभी रुके ना आठो याम
शीतल, सूखा, वर्षा, घाम
जिस पर दृष्टि हमारी जड़ी
क्या सखि साजन, नहिं सखि घड़ी

१०
यह जग दीखे जिसके द्वारा
तपता सूरज और फुहारा
सबको नित्य दिखाय करिश्मा
क्या सखि साजन, नहिं सखि चश्मा

- प्रो.विश्वम्भर शुक्ल
१ अगस्त २०२६

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