अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

कृष्ण कन्हैया
     

 





 

 


 




 


बीच धार में सबकी नैया कृष्ण कन्हैया
हर नैया का एक खेवैया कृष्ण कन्हैया

फिर सबके मन में गूँजें मीठी तानें
फिर से आ जा रास रचैया कृष्ण कन्हैया

जीवन भ्रष्ट हुआ मानवता हुई कलंकित
दर दर भटके तेरी गैया कृष्ण कन्हैया

लाखों दुर्योधन दुःशासन ताल ठोंकते
करे द्रौपदी ता ता थैया कृष्ण कन्हैया

धन के पीछे मन जीवन सब बेच रहे हैं
अब सबका भगवान रुपैया कृष्ण कन्हैया

आजा फिर से विजय दिला दे सज्जनता को
तेरे जैसा कौन लडैया कृष्ण कन्हैया

-कमलेश श्रीवास्तव
२६ अगस्त २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter