अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

नये साल के नये माह का मौसम
 
नये साल के नये माह का
मौसम आया
लेकिन सूरज भौंचक
कितना घबराया है!

चटख रंग की हवा चली है
चलन सीख कर
खेल खेलती,
बंदूकों के राग सुनाती
उनियाये कमरों में
बच्चे रट्टा मारें
पंथ-पृष्ठ की तहरीरों से
'वाद' सिखातीं
मंतव्यों में तथ्य नहीं,
बस तेरा-मेरा
सत्य वही जो
सबसे जबरन मनवाया है!

सरसाता है ख़ौफ
उजाला झींसी-झींसी
अगला करे सवाल--
'पंथ के नाम उचारें'
यह कैसा संभाव्य,
देह बारूद-छुई ले
सहमे-सहमे लोग
बाड़ में बने कतारें
नया सवेरा कैसा
जब आशाएँ सोयीं
हृदय हूक से भरा हुआ
फिर बह आया है!

किन मूल्यों को प्रात समेटे
बहका आया
उन्मादों की हनक
क्रोध के चिह्न भाल पर
सिर की गिनती मात्र लक्ष्य हो
यदि चिंतन का
लानत ऐसे किसी क्रोध
या वाक्-जाल पर!
चिता-दग्ध है
किन्तु, क्षार है, सम्यक उर्वर
लिए ओस नम तभी हरा
मन रह पाया है!

- सौरभ पांडेय
२९ दिसंबर २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter