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     .  उड़ रहा है मन

 
उड़ रहा है मन गगन में
आज इक पतंग सा

एक श्याम विवर में
धूप जैसे खिल गई
पाती तुम्हारी प्रिय
आज मुझे मिल गई
आसमान में खिला है
धनुष सात रंग का

विडम्बना नियति की थी
फासले घने हुये
दिख रहे थे मध्य में
वितान से तने हुये
रेशमी धागा था किन्तु
बीच में अभंग सा

पलट पृष्ठ पढ़ रहे हैं
प्रीति की किताब को
आखर-आखर में बसी
मोतियों की आब को
है अपना तो अनुबन्ध
अलग अपने ढँग का

- मधु प्रधान
१ जनवरी २०२३

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