अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

सूरज रथ मुड़ने लगा
 
सूरज रथ मुड़ने लगा, नभ में उत्तर ओर
सोना-सोना हो गई, धूप नहाई भोर

उषा किरण ने ओढ़ ली, चुनरी सोनल रंग
पर्वत-पर्वत पग धरे, चलते संग अनंग

चौराहे पे चौकड़ी, जलता बीच अलाव
अंगीठी कोने पड़ी, मोल मिला ना भाव

सूरज दर्शन की घड़ी, जन-जन करता ध्यान
दादी ने भी कर लिया, हर-हर गंगे स्नान

छत चौबारे धूम सी, उडती देख पतंग
दोपहरी की नींद अब, शोर-शोर में भंग

दिन-दिन खिंचते जा रहे, लम्बे ताड़ समान
रातों की होने लगी, नाटी सी पहचान

नैनन को अब रुच गए, गुड़, तिल, खिचड़ी थाल
जिह्वा हँस-हँस पूछती, अखरोटों का हाल

पनघट पर सजने लगे, त्योहारों के छंद
मेले-ठेले, हाट में, बिकते बाजूबंद

खेतों में फसलें खड़ी, कृषकों में उन्माद
मेड़-मेड़ का आपसी, छूटा वाद-विवाद

बदले-बदले से लगे, शीतल ऋतु के ढंग
ओढ़ दुशाला चल पड़ी, पोष मास के संग

- शशि पाधा
१५ जनवरी २०१७

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter