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दिन संक्रांति प्रयाग नहाएँ
 
थोडा ताप बढ़ाओ ना
ओ सूरज बाबू
आओ ना

ना गहरी निंदिया टूट रही
ना कम्बल खटिया छूट रही
घना-घना है कुहरा काबिज
जग जैसे लगता अभिशापित
आ इससे हमें
बचाओ ना

अब तो दिन संक्रांति पास है
तिल गुड़वा की लगी आस है
फूली छीमी मटर डिढ़ानी है
देखा ढूँढ़ी पर चढ़ी जवानी है
संग मेरे मौज
मनाओ ना

दिन संक्रांति प्रयाग नहाएँ
सुरज देव को अर्ध्य चढ़ाएँ
परमारथ की राह दिखाएँ
दान धर्म कर पुण्य कमायें
चूकें जहाँ,
बताओ ना

- अनिल कुमार मिश्र
१५ जनवरी २०१७

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