अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

दीप धरो
वर्ष २०१२ का दीपावली संकलन

1
तुम फिर आओगे राम



 

तुम एक बार जीत कर लंका को,
संहार कर असुरों को
विजेता बन कर आये थे,
तब हमने खुशियों के दीप जलाए थे,
और तब से लेकर आज तक,
हम उसी परंपरा को निभा रहे हैं,
हर साल,
तुम्हारी वापसी के दिन को,
वैसे ही दीप जला कर मना रहे हैं।
हालांकि वह थी घनघोर अँधेरे की रात,
जब तुम लौट कर आये थे,
पर तुम्हारे वापस आने की ख़ुशी
में हम फूले नहीं समाये थे।
क्योंकि तुम अपने साथ लाये थे,
हमारे टूटे सपनो को जोड़ने का विश्वास,
हमारी दबी कुचली आशाओं को सच करने का एहसास,
और निराशाओं के अँधेरे में जगमगाने खुशियों की आस।
वही आस, वही एहसास, वही विश्वास,
जो तुम पर है आज भी,
हमारे दीपों में रौशनी बन कर जलता है,
जिसे देख कर अमावस की स्याह रात का
भी हृदय डरता है।
आज भी हम वैसे ही मनाते हैं दिवाली,
मनाते हैं खुशियाँ, सजाते हैं दीपों की लड़ियाँ .
आज भी अन्धकार से घिरा है
हमारा आकाश,
और हमें है आज भी यह विश्वास
तुम आओगे, ज़रूर आओगे,
फिर एक बार।

--संजीव निगम
१२ नवंबर २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter