अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

रामधुन गाने लगीं उजयारियाँ

   



 


तार यों झनका गईं मतवारियाँ
रामधुन गाने लगीं उजियारियाँ !

तिमिर जीते ज्योति के संकल्प ने
कौन से युग में न थीं दुश्वारियाँ !

मौन हैं पर भ्रमरगीतों- सी लगें
रोशनी की रात में फुलवारियाँ !

दियों के अधरों ने ऐसे छू लिया
फूलझड़ियों-सी हँसीं चिंगारियाँ !

प्रश्न भटके फिर रहे उत्तर बिना
अश्वमेधी व्यर्थ सब तैयारियाँ !

देख लो दशमुख मिटा देंगी तुम्हें
यदि विभीषण बन गईं लाचारियाँ !

--अश्विनी कुमार विष्णु
२८ अक्तूबर २०१३

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter